शिक्षा का आलोक प्राप्त कर लोक दीप्त है जिससे।
दीप्त प्रज्वलित हो जाते बनते प्रदीप्त हैं जिससे ।।
है जिसका संकल्प अंधेरा कहीं न टिकने देंगे।
और अविद्या से विद्या-रथ कभी न रुकने देंगे।।
देश-धर्म-जाति के रक्षक जिसने दिये सिपाही।
और आरती सरस्वती माता की नित अवगाही।।
रत्नाकर गंभीर, ज्ञान का अतिशय पारावार,
जयतु जय विद्यालय परिवार।
जयति महाविद्यालय परिवार।।
॥ १ ॥
आजादी के बाद राष्ट्र-निर्माण घड़ी आयी थी।
नयी चुनौती शिक्षा की अत्यंत कड़ी आयी थी।।
चहुँमुखी देशोन्नति खातिर शिक्षा की तरकीब रखी।
छठे दशक में साहू जी ने विद्यालय की नींव रखी।।
जिसने पथिकों को जीवन-पथ दिखलाकर सम्मान किया।
शिशुओं को चलना सिखला विहगों को भव्य विहान दिया।।
वीणा का छेड़ा इकतारा मधुरिम सा सुरताल हुआ।
श्री जगदीशसरन का रोपा पौधा वृक्ष विशाल हुआ।।
जिसकी शीतल छाया में अध्येता कई हजार,
जयतु जय विद्यालय परिवार।
जयति महाविद्यालय परिवार।।
॥ २ ॥
विज्ञान-कला-वाणिज्य संग तकनीकि का है मेल यहाँ।
शिक्षा है अध्यात्म-समन्वित स्वास्थ्य हेतु हैं खेल यहाँ।।
गौरवबोध विरासत का है यहाँ संस्कृति का परिचय।
गुरुजन गिरा उचार रहे हैं ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’।।
यह काशी और तक्षशिला संग नालंदा है बोधगया।
उपयोगी जीवनदर्शन का सुलभ हुआ अध्याय नया।।
द्विगुणित महिमा कर देते हैं शिक्षा संग संस्कार,
जयतु जय विद्यालय परिवार।
जयति महाविद्यालय परिवार।।
॥ ३ ॥